दर्द...
जिनका अर्थ शायद कोई
समझ ना सके,
अपने मायने खो देता है...
कुछ ज़ख्म,
जिनका दर्द शायद कोई
महसूस ना कर सके,
अपने एहसास खो देता है...
कुछ शब्द समझा नहीं पाते
दर्द के एहसास को,
और कुछ दर्द ऐसे भी हैं
जो शब्दों में बयान नहीं हो पाते...
क्यूँ जुबां तक आते-आते
दर्द आँखों से बह जाता है,
और क्यूँ ज़ख्मों को वक़्त पर
शब्द नहीं मिल पाता है...
क्यूँ उम्मीदों को हमेशा
ठोकरें मिला करती हैं,
और क्यूँ सपनों को हमेशा
हकीकत छला करती हैं...
आस-पास कोई अपना नहीं,
आँखों में कोई सपना नहीं,
गुज़रती ज़िन्दगी में कल नहीं,
हँसते-मुस्कुराते दो पल नहीं...
बस ये दर्द ही साथ रहता है,
जिंदा होने का एहसास रहता है..
किन्हीं बैलों के कन्धों पर
ठहरा होगा भादो का महीना
कुछ वाक्य ठहर गए होंगे
किसी राजकवि की कलम की नोक पर
किन्ही निराश प्रेमियों के ख्यालों में
ठहर गई होगी अँधेरी रात की कोई निर्जन बेला
माशा भर काजल
बुढाती हुई माँ की उँगलियों पर ठहर कर काँप रहा होगा
अस्पताल में भर्ती मरीजों की स्मृतियों में
ठहरा होगा सूर्योदय का दृश्य
सीमा पर तैनात किसी फौजी के कानों में
तोतले बोल ठहर गए होंगे
किन्ही सेवानिवृत बुजुर्गों के जेहन में ठहरा होगा
नौकरी का पहला दिन
किसी कैदी की पथराई आँखों में
नीले आसमान का कोई टुकड़ा ठहर कर रह गया होगा
किसी बेरोजगार लड़के के भारी क़दमों में
ठहरी होगी कोई फुटबाल
ठहरा सा होगा भंडारे में खाए हलवे का स्वाद
किसी भिखारी की जीभ पर
किसी कूड़ा बीनने वाले बच्चे के मैले हाथों में
अचानक से ठहर गई होगी कोई फुलझरी
हमेशा के लिए ठहर गई होगी बारूद की गंध
किसी अपाहिज फेरी वाले के नथुनों में
किन्हीं मजदूरनियों के रूखे बालो की जड़ो में
ठहर कर बैठा होगा चिपचिपाता पसीना
प्रसव पीड़ा किसी वेश्या की कमर में ठहरी होगी
किसी नौजवान विधवा के गले में
करवा चौथ की प्यास ठहर गई होगी
आते-आते ठहर गए होंगे कुछ सवाल
किन्हीं बड़ी होती बच्चियों के स्निग्ध होठों पर.
ठहरा होगा भादो का महीना
कुछ वाक्य ठहर गए होंगे
किसी राजकवि की कलम की नोक पर
किन्ही निराश प्रेमियों के ख्यालों में
ठहर गई होगी अँधेरी रात की कोई निर्जन बेला
माशा भर काजल
बुढाती हुई माँ की उँगलियों पर ठहर कर काँप रहा होगा
अस्पताल में भर्ती मरीजों की स्मृतियों में
ठहरा होगा सूर्योदय का दृश्य
सीमा पर तैनात किसी फौजी के कानों में
तोतले बोल ठहर गए होंगे
किन्ही सेवानिवृत बुजुर्गों के जेहन में ठहरा होगा
नौकरी का पहला दिन
किसी कैदी की पथराई आँखों में
नीले आसमान का कोई टुकड़ा ठहर कर रह गया होगा
किसी बेरोजगार लड़के के भारी क़दमों में
ठहरी होगी कोई फुटबाल
ठहरा सा होगा भंडारे में खाए हलवे का स्वाद
किसी भिखारी की जीभ पर
किसी कूड़ा बीनने वाले बच्चे के मैले हाथों में
अचानक से ठहर गई होगी कोई फुलझरी
हमेशा के लिए ठहर गई होगी बारूद की गंध
किसी अपाहिज फेरी वाले के नथुनों में
किन्हीं मजदूरनियों के रूखे बालो की जड़ो में
ठहर कर बैठा होगा चिपचिपाता पसीना
प्रसव पीड़ा किसी वेश्या की कमर में ठहरी होगी
किसी नौजवान विधवा के गले में
करवा चौथ की प्यास ठहर गई होगी
आते-आते ठहर गए होंगे कुछ सवाल
किन्हीं बड़ी होती बच्चियों के स्निग्ध होठों पर.

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