जानते हैं
सरहद होती नहीं
कोई ईमान की..
ये भी सच है कि
हद होती नहीं
कोई फ़र्ज़ की .
तब क्या करे
वो गरीब विधवा
जो निस्सहाय
और निरीह हो ?
क्या करे वो
जब छोटे बच्चों की
जिंदगी की
सूत्रधार हो ?
इस दुनियां के
मकड़जाल में,
जब रूप की धूप
तन पे हो
और इंसानी
भूखी आँखों का
ना कोई
दीन ईमान हो.
कैसी कठिन डगर है उसकी
जिसका ना
सरमायेदार हो ?
चल दिया जो छोड़
उसे जूतों में लगी
धूल सा,
चल दिया जो
पोंछ कर
कुर्बानियां उसकी
काँटों के पापोश पर.
क्या करे वो जब
आत्मा से बड़े
पेट का संताप हो ?
तब न क्या
रात के अंधेरों में
चिल्लर सी
खर्च हो जायेगी वो ?
या जिंदगी की
शतरंज पर
हर मोहरे से
पिट जायेगी वो ?
हाय कैसी ये दुर्गति,
ये कैसा अभिशाप है
हाय रे विधवा
गरीबी ही तेरा
श्राप है ...!!
इक बार लौटा दो,
फिर से पूरी रात
वो लफ्ज़ दोहरा दो..
कि मुझसे बहुत प्यार करते हो..!!
दिल की बातों को
पढ़ लेना और...
'जान' कह...
ढेरों प्यार कर कहना...
कि मुझसे बहुत प्यार करते हो..!!
वो तुम्हारा
हिज्र की रातों में
फूट कर रोना और कहना..
कि मुझसे बहुत प्यार करते हो..!!
गुजरी रातों पे आज
नए वादों की ख्वाहिश है ..
नए वादों की ख्वाहिश है ..
बस एक बार फिर से कह दो...
अगर हम हसरतों की
कब्र में दफ़न हो जाएँ...
तो यह कब्रों पर लिखवा देना..
कि मुझसे बहुत प्यार करते हो..!!


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