सुस्वागतम........ ब्लॉग के माध्यम से मेरा प्रयास है कि मैं अपने विचारों, भावनाओं को अपने पारिवारिक दायित्व निर्वहन के साथ-साथ कुछ सामाजिक दायित्व को समझते हुए सरलतम अभिव्यक्ति के माध्यम से लिपिबद्ध करते हुए अधिकाधिक जनमानस के निकट पहुँच सकूँ. इसके लिए आपके सुझाव, आलोचना, समालोचना आदिका आकांक्षी हूँ. जो भी आप कहना चाहें बेहिचक लिखें, ताकि मैं अपने प्रयास में बेहत्तर कर सकने की दिशा में निरंतर अग्रसर रह सकूँ......HASU GADHAVI
ગુરુવાર, 8 નવેમ્બર, 2012
રવિવાર, 23 સપ્ટેમ્બર, 2012
महा भारत की सच्चाई क्या यही हे ?
महा भारत की सच्चाई क्या यही हे ?
28वे वेद व्यास ने लिखी महाभारत
ज्यादा तर लोगो को लगता हे कि महाभारत वेद व्यास ने लिखी थी ! लेकिन यह पूरा सच नहीं हे ! वेद व्यास कोई नाम नहीं बल्कि एक उपाधि थी, जो वेदों का ग्यान रखने वाले लोगोको दी जाती थी ! कृष्ण द्रैपायन से पहले 27 वेद व्यास हो चुकेथे , जबकि वह खुद 28 वे वेदव्यास थे ! उनका नाम कृष्ण द्रैपायन इसीलिए गया था क्योकि उनका रंग सावला(कृष्ण ) था और वह एक द्रीप रखा पर जन्मे थे !
तारीख -5/10/2012
(2)
माना जाता हे की श्रीमद भागवत गीता ही अकेली गीता हे , जिसमे कृष्ण द्वारा दिए गए ज्ञान का वर्णन हे ! यह सच हे कि श्रीमद भागवत गीता ही सम्पूर्ण और प्रमाणिक गीता हे , लेकिन इसके आलावा कम से कम 10 गीता और भी हे ! गीता व्याध गीता,अष्टावक्र गीता, और पाराशर गीता उन्हीमे से हे !
(3)
द्रौपदी के लिए दुर्योधन के इशारे का मतलब?
मौलिक महाभारत में यह प्रसंग आता हे की चौसर के खेल में युधिष्ठिर से जितने के बाद दुर्योधन ने द्रौपदी को अपनी बाई जांग पर बेठने के लिए कहा था ! ज्यादातर लोगो की नजर में इस बजह से भी दुर्योधन खलनायक हे ! उसमे तमाम बुराइया जरुर थी! लेकिन उस समय की परमपरा के मुताबिक यह द्रौपदी का अपमान नहीं था ! दर असल उस ज़माने दाई जंगा पर या दाई ओर पत्नी को और बाई जंगा पर या बाई और पुत्री, को बिठाया जाता था ! यही बजह हे की धार्मिक पोस्टरों या केलेंडर में देवियों को बाई तरफ स्थान दिया जाता हे, और हिन्दू रीती रिवाजो में शादी के समय पत्नी पति के बाई और खड़ी होती हे ! શનિવાર, 8 સપ્ટેમ્બર, 2012
MY PHOTO
જે અશ્રુ થી આંખો ને શણગારતા નથી
એને દુનિયાના દર્દ કદિ જણાતાં નથી
ઝાંજવાની જેમ રેખાઓ ભાગ્યની છળ તી રહી ને
હાથના હરણાં બિચારા કેટલા તરસ્યા 'હસમુખ'
જૈસે જીન્દગાની દો નીગાહોમે સીમટતી જા રહી હે
પ્યાસ બઢતી જા રહી હે ઓર ઉમ્ર કટતી જા રહી હે
આજે 8 SEPTEMBER
મારો જનમ દિવસ છે બહુ મજા કરી આજે મિત્રો સાથે અને ગણ બધા મેસેજ પણ આવ્યા
જે અહી લખવાની ઈચ્છા થઇ ગઈ અને સાચેજ બહુ બહુ મજા કરી દિલ માં પણ આનંદ ના
ફુવારા છૂટવા માંડ્યા ગરેથી દુર રહીને પણ આજે ફરીથી ખાસ પાર્ટી દ્વારા
મનોમન એક
અદ્ ભૂત આનંદ મળ્યો
બસ આજના દિવસે ભગવાન એટલુજ માંગું છુ
આ ચેતનાનો કણ જાળવી હું
અમાનુષી દાનવતાપ્રપાતે
બૂઝાઈ જાતો હું લઈ બચાવી,
એ ચેતનાને અધિકાધિક હું
પ્રજ્વાળવા ઈચ્છું અહીં
હસમુખ અહીજ !!
આ ભૂમિમાં, માનવદેહ માંહે
પુનઃ પુનઃ પ્રાર્થું હું જન્મ મારો.
જે જે કણોથી ઘટ આ ઘડાયો,
પાછા દઉં તે સૌ વ્યાજ સાથે,
મારું અહં પોષું કદી ન એથી,
ન સ્વાર્થનાં મંદિર બાંધું એ
અનંતનો દીપકવાહી હું આ અકલ્પ્ય પંથે પળનાર હું જે મનુષ્ય જન્મ્યો, મરતાં સુધી હું ‘હતો ખરો માણસ’ બની રહું; જ્યાં પાય મારા તહીં શીશ મારું, જ્યાં દેહ મારો તહીં હૈયું મારું, વસુંધરાનું વસુ થાઉં તો સાચું, હું માનવી માનવ થાઉં તો ઘણું !
However you decide to spend
This very special day,
Here is hoping
It turns out to be
Just right in every way!
Happy birthday.
It’s a nice feeling when you know that someone likes you,
Someone thinks about you, someone needs you;
But it feels much better when you know that
Someone never ever forgets your birthday.
HAPPY BIRTHDAY.
Your birthday is a great day to
Celebrate how special you’re as a person
and how much it means to know we’re a family
Happy birthday to my very special brother
મંગળવાર, 28 ઑગસ્ટ, 2012
चंद मुलाकात
रास्ता
थोड़ी सी बात हुई
चंद मुलाकात हुई
वे अपना मान बैठे
जाने क्या बात हुई
देखते आये थे जिसे
करने लगे ‘प्यार’ उसे
वे इसे ही समझ बैठे
जग समझे चाहे जिसे
प्यार में सिमटने लगे
दूर सबसे छिटकने लगे
आंखों में सपने लिए
रात भर जगने लगे
दिखते न थे जो आसपास
डालते नहीं थे सूखी घास
उनकी नज़र में आने लगे
वही अब बन खासमखास
पर जब लंबे अरसे बाद
उनसे हुई एक मुलाकात
न थी आंखों में रौनक
न होंठों पे पहले जैसी बात
मुर्दानी सूरत नज़र आई
चेहरे पर उड़ती थी हवाई
कसम खाते थे जिस प्यार की
उसी से थी अब रुसवाई
प्यार की है अजीब दास्तां
जिनका नहीं प्यार से वास्ता
वे भी चल पड़ते हैं अक्सर
छोड़कर अपना सीधा रास्ता
बैठते जो कभी पास मेरे
तो समझाती राज गहरे
होती न उनकी ये हालत
पढ़ते न प्यार के ककहरे
चंद मुलाकात हुई
वे अपना मान बैठे
जाने क्या बात हुई
देखते आये थे जिसे
करने लगे ‘प्यार’ उसे
वे इसे ही समझ बैठे
जग समझे चाहे जिसे
प्यार में सिमटने लगे
दूर सबसे छिटकने लगे
आंखों में सपने लिए
रात भर जगने लगे
दिखते न थे जो आसपास
डालते नहीं थे सूखी घास
उनकी नज़र में आने लगे
वही अब बन खासमखास
पर जब लंबे अरसे बाद
उनसे हुई एक मुलाकात
न थी आंखों में रौनक
न होंठों पे पहले जैसी बात
मुर्दानी सूरत नज़र आई
चेहरे पर उड़ती थी हवाई
कसम खाते थे जिस प्यार की
उसी से थी अब रुसवाई
प्यार की है अजीब दास्तां
जिनका नहीं प्यार से वास्ता
वे भी चल पड़ते हैं अक्सर
छोड़कर अपना सीधा रास्ता
बैठते जो कभी पास मेरे
तो समझाती राज गहरे
होती न उनकी ये हालत
पढ़ते न प्यार के ककहरे
दो पल
दर्द...
जिनका अर्थ शायद कोई
समझ ना सके,
अपने मायने खो देता है...
कुछ ज़ख्म,
जिनका दर्द शायद कोई
महसूस ना कर सके,
अपने एहसास खो देता है...
कुछ शब्द समझा नहीं पाते
दर्द के एहसास को,
और कुछ दर्द ऐसे भी हैं
जो शब्दों में बयान नहीं हो पाते...
क्यूँ जुबां तक आते-आते
दर्द आँखों से बह जाता है,
और क्यूँ ज़ख्मों को वक़्त पर
शब्द नहीं मिल पाता है...
क्यूँ उम्मीदों को हमेशा
ठोकरें मिला करती हैं,
और क्यूँ सपनों को हमेशा
हकीकत छला करती हैं...
आस-पास कोई अपना नहीं,
आँखों में कोई सपना नहीं,
गुज़रती ज़िन्दगी में कल नहीं,
हँसते-मुस्कुराते दो पल नहीं...
बस ये दर्द ही साथ रहता है,
जिंदा होने का एहसास रहता है..
किन्हीं बैलों के कन्धों पर
ठहरा होगा भादो का महीना
कुछ वाक्य ठहर गए होंगे
किसी राजकवि की कलम की नोक पर
किन्ही निराश प्रेमियों के ख्यालों में
ठहर गई होगी अँधेरी रात की कोई निर्जन बेला
माशा भर काजल
बुढाती हुई माँ की उँगलियों पर ठहर कर काँप रहा होगा
अस्पताल में भर्ती मरीजों की स्मृतियों में
ठहरा होगा सूर्योदय का दृश्य
सीमा पर तैनात किसी फौजी के कानों में
तोतले बोल ठहर गए होंगे
किन्ही सेवानिवृत बुजुर्गों के जेहन में ठहरा होगा
नौकरी का पहला दिन
किसी कैदी की पथराई आँखों में
नीले आसमान का कोई टुकड़ा ठहर कर रह गया होगा
किसी बेरोजगार लड़के के भारी क़दमों में
ठहरी होगी कोई फुटबाल
ठहरा सा होगा भंडारे में खाए हलवे का स्वाद
किसी भिखारी की जीभ पर
किसी कूड़ा बीनने वाले बच्चे के मैले हाथों में
अचानक से ठहर गई होगी कोई फुलझरी
हमेशा के लिए ठहर गई होगी बारूद की गंध
किसी अपाहिज फेरी वाले के नथुनों में
किन्हीं मजदूरनियों के रूखे बालो की जड़ो में
ठहर कर बैठा होगा चिपचिपाता पसीना
प्रसव पीड़ा किसी वेश्या की कमर में ठहरी होगी
किसी नौजवान विधवा के गले में
करवा चौथ की प्यास ठहर गई होगी
आते-आते ठहर गए होंगे कुछ सवाल
किन्हीं बड़ी होती बच्चियों के स्निग्ध होठों पर.
ठहरा होगा भादो का महीना
कुछ वाक्य ठहर गए होंगे
किसी राजकवि की कलम की नोक पर
किन्ही निराश प्रेमियों के ख्यालों में
ठहर गई होगी अँधेरी रात की कोई निर्जन बेला
माशा भर काजल
बुढाती हुई माँ की उँगलियों पर ठहर कर काँप रहा होगा
अस्पताल में भर्ती मरीजों की स्मृतियों में
ठहरा होगा सूर्योदय का दृश्य
सीमा पर तैनात किसी फौजी के कानों में
तोतले बोल ठहर गए होंगे
किन्ही सेवानिवृत बुजुर्गों के जेहन में ठहरा होगा
नौकरी का पहला दिन
किसी कैदी की पथराई आँखों में
नीले आसमान का कोई टुकड़ा ठहर कर रह गया होगा
किसी बेरोजगार लड़के के भारी क़दमों में
ठहरी होगी कोई फुटबाल
ठहरा सा होगा भंडारे में खाए हलवे का स्वाद
किसी भिखारी की जीभ पर
किसी कूड़ा बीनने वाले बच्चे के मैले हाथों में
अचानक से ठहर गई होगी कोई फुलझरी
हमेशा के लिए ठहर गई होगी बारूद की गंध
किसी अपाहिज फेरी वाले के नथुनों में
किन्हीं मजदूरनियों के रूखे बालो की जड़ो में
ठहर कर बैठा होगा चिपचिपाता पसीना
प्रसव पीड़ा किसी वेश्या की कमर में ठहरी होगी
किसी नौजवान विधवा के गले में
करवा चौथ की प्यास ठहर गई होगी
आते-आते ठहर गए होंगे कुछ सवाल
किन्हीं बड़ी होती बच्चियों के स्निग्ध होठों पर.
तुम संग कोई रिश्ता है
पिछले जन्मों का कोई रिश्ता है
तुम संग जो गहरी प्रीत बढ़ी
रूह से रूह का कोई नाता है
बिन कहे ही दिल को आभास हुआ
जब रूह को कोई भी टीस हुई
फिर ना जाने क्यों मन टूटा
क्यों प्रीत में गहरी सेंध लगी.
पहले पहरों - पहरों की बातें
घंटों में सिमटनी शुरू हुई
आड़े आ गयी मजबूरियाँ सारी
दीवारें खिंच खिंच बढती गयी .
धीरे से समझाया मन को मैंने
कि ऐसा भी कभी होता है
साथी हो मजबूर बहुत तो
अरमानों को रोना होता है .
दबे पाँव फांसले आये
कई रूपों में दमन किया
अश्क प्रवाह बढते गए
कड़वाहटों ने फिर जन्म लिया.
विचारों के नश्तर यूं टकराए
जुबा के उच्चारण बदलने लगे
मन ने मन की नहीं सुनी
सुख - दुख भी अनजाने हुए .
इक दूजे को आंसू दे
दिल के जख्म सुखाने चले
मरहम जो देने थे आपस में
मवादों के ढेर जमाने लगे .
विकारों की ऐसी आंधी आई
भाव शून्य दिल होने लगा
आह ! कितने हम बदल गए
अश्कों से भी ना मैल धुला .
हर गम को नौटंकी समझे
रूह की बातें कहाँ रही
इतना प्यार गहराया देखो
रूह के रिश्ते चटक गए .
बस एक आखरी अरज है मेरी
एक करम और कर डालो
अंतिम बंधन जो शब्दों का है
विवशता की उस पर भी शिला धरो .
चाहत अपनी कर दो ज़ाहिर
अब कोई रिश्ता न शेष रहे
यादों की गंगा -यमुना में
ना इस रिश्ते का कोई अवशेष रहेईमान की सरहद
जानते हैं
सरहद होती नहीं
कोई ईमान की..
ये भी सच है कि
हद होती नहीं
कोई फ़र्ज़ की .
तब क्या करे
वो गरीब विधवा
जो निस्सहाय
और निरीह हो ?
क्या करे वो
जब छोटे बच्चों की
जिंदगी की
सूत्रधार हो ?
इस दुनियां के
मकड़जाल में,
जब रूप की धूप
तन पे हो
और इंसानी
भूखी आँखों का
ना कोई
दीन ईमान हो.
कैसी कठिन डगर है उसकी
जिसका ना
सरमायेदार हो ?
चल दिया जो छोड़
उसे जूतों में लगी
धूल सा,
चल दिया जो
पोंछ कर
कुर्बानियां उसकी
काँटों के पापोश पर.
क्या करे वो जब
आत्मा से बड़े
पेट का संताप हो ?
तब न क्या
रात के अंधेरों में
चिल्लर सी
खर्च हो जायेगी वो ?
या जिंदगी की
शतरंज पर
हर मोहरे से
पिट जायेगी वो ?
हाय कैसी ये दुर्गति,
ये कैसा अभिशाप है
हाय रे विधवा
गरीबी ही तेरा
श्राप है ...!!
इक बार लौटा दो,
फिर से पूरी रात
वो लफ्ज़ दोहरा दो..
कि मुझसे बहुत प्यार करते हो..!!
दिल की बातों को
पढ़ लेना और...
'जान' कह...
ढेरों प्यार कर कहना...
कि मुझसे बहुत प्यार करते हो..!!
वो तुम्हारा
हिज्र की रातों में
फूट कर रोना और कहना..
कि मुझसे बहुत प्यार करते हो..!!
गुजरी रातों पे आज
नए वादों की ख्वाहिश है ..
नए वादों की ख्वाहिश है ..
बस एक बार फिर से कह दो...
अगर हम हसरतों की
कब्र में दफ़न हो जाएँ...
तो यह कब्रों पर लिखवा देना..
कि मुझसे बहुत प्यार करते हो..!!
મંગળવાર, 21 ઑગસ્ટ, 2012
आस्था
अन्धेरा हो गया
मैंने कहा
अँधेरा नहीं हुआ
उजाला चला गया
कोई बोला सर्दी आ गयी
मैं बोला गर्मी चली गयी
फिर किसी ने कहा
इश्वर होता है
मैंने पूछा
क्या तुम ने देखा है
उत्तर मिला
मुझे इश्वर में आस्था है
मैंने कहा
जैसा मानोगे ,
जैसा सोचोगे
वैसा ही देखोगे
क्यों नहीं
घ्रणा में प्यार देखो
इर्ष्या में
सदभावना देखो
इर्ष्या करोगे इर्ष्या
पाओगे,
घ्रणा करोगे घ्रणा
पाओगे
विश्वास करोगे विश्वास
पाओगे
अच्छा सोचोगे अच्छा
करोगे
खुशी से जीवन जियोगे
तुम्हारा अहसास ही काफी है
जहन में
उतर जाती है
तुम्हारी हर बात
दिल को छूती है
तुम्हारी खुशबू
मदहोश करती है
तुम्हें पाया तो नहीं
जीने के लिए
तुम्हारा अहसास ही
काफी हैમંગળવાર, 14 ઑગસ્ટ, 2012
तुम्हारी तस्वीर
तेरी तस्वीर...
...कल उंगली से रेत पर
तुम्हारी तस्वीर बनाई मैंने...
.....एक लहर आई
अपने साथ ले गई..
....फिर क्या था
हर तरफ, हर जगह
बस तुम ही तुम...
.....समंदर में तुम
उमस में तुम
बादलों में तुम
बारिश की बूंदों में तुम
हर फूटती कोंपल में तुम
ताज़ी हवाओं में तुम
साँसों में तुम..........
...आज तुम ही हो
जो मुझ को जिंदा रखे हो...
हर शै को जिंदा रखे हो...
ज़िन्दगी को जिंदा रखे हो...
...कल उंगली से रेत पर
तुम्हारी तस्वीर क्या बना दी मैंने...
रस्म दुनिया की
गज़ल -
गज़ल
उसकी अर्थी को उठा कर रो दिये थेरस्म दुनिया की निभा कर रो दिये थे
नाज़ से पाला जिसे माँ बाप ने था
आग पर उसको लिटा कर रो दियेथे
थी उम्र शहनाइयाँ बजती मगर अब
मौत का मातम मना कर रो दिये थे
दी सलामी आखिरी नम आँखों से जब
दिल के ट्कडे को विदा कर रो दियेथे
यूँ सभी अरमान दिल मे रह गये थे
राख सपनो की उठा कर रो दिये थे
थी बडी चाहत कभी घर आयेगा वो
लाश जब आयी सजा कर रो दिये थे
था चिरागे दिल मगर मजबूर थे सब
अस्थियाँ गंगा बहा कर रो दिये थे
वो सहारा ले गया जब छीन हम से
सिर दिवारों से सटा कर रो दिये थे
रोक लें आँसू मगर रुकते नही अब
दर्द का दरिया बहा कर रो दिये थे
माँ ग ली उसने रिहाई क्यों खुदा से
कुछ गिले शिकवे सुना कर रो दिये थे
प्यार हो सकता है?
फोन पर मैसेज आया, “तुझे कभी आठ घंटों में प्यार हुआ है?” प्रिया समझ गई फैसल को फिर किसी से प्यार हो गया है। उसने जवाब भेजा, “नहीं...पर जानती हूं तुझे हुआ है।”
प्रिया का मन फिर काम में नहीं लगा। जैसे-तैसे खानापूर्ति करके वो ऑफिस से जल्दी निकल तो आई लेकिन इतनी जल्दी घर जाने का न ही उसका मन था और न ही आदत। काफी देर बस स्टॉप पर खड़े रहने के बाद प्रिया को एक खाली बस आते हुए दिखाई दी। हालांकि वो बस उसके घर की तरफ नहीं जा रही थी लेकिन प्रिया को लगा जैसे ये बस सिर्फ उसी के लिए आई है। प्रिया बस में चढ़ गई और खाली सीटों में से अपनी पसंदीदा बैक सीट पर खिड़की के पास बैठ गई। फैसल और प्रिया कॉलेज के दिनों में अक्सर इसी तरह खाली बसों में शहर के चक्कर लगाया करते थे। टिकट की कोई चिंता ही नहीं रहती थी क्योंकि बैग के कोने में स्टूडेंट बस पास पड़ा होता था।
फोन फिर वाइब्रेट हुआ। इस बार मैसेज संदीप का था। संदीप प्रिया का कलीग था। ऑफिस से दोनों अक्सर साथ आते-जाते थे। प्रिया जानती थी संदीप उसे पसंद करता है लेकिन प्रिया जानकर अनजान बने रहना ही ठीक समझती थी। फैसल के जाने के बा उसने अपने आपको एक दायरे में सीमित कर लिया था। मैसेज में संदीप ने लिखा था कि वो कहां है? प्रिया को याद आया कि जल्दबाज़ी में वो संदीप को बताकर आना भूल गई है। प्रिया ने जवाब दिया, “तबियत ठीक नहीं थी, जल्दी चली आई।” अब प्रिया ने फोन बैग में रख दिया। इस वक्त उसकाकिसी से बात करने का मन कर रहा था।
खिड़की से शाम की ठंडी हवा आ रही थी। प्रिया आंखे बंद कर सीट से टिक गई। प्रिया को अजीब सी बेचैनी महसूस हो रही थी। रह रह कर वह फैसल के “आठ घंटे के प्यार” के बारे में सोच रही थी। हालांकि वो काफी पहले अपने आपको समझा चुकी थी कि अब फैसल की ज़िंदगी में अब चाहे जो कुछ हो उसे फर्क नहीं पड़ेगा। अपने इस फैसले पर वो काफी खुश भी थी लेकिन फैसल का ये नया प्यार प्रिया को चैन नहीं लेने दे रहा था। प्रिया लगातार सोच रही थी कि फैसल उसके दो साल के प्यार को इस तरह कैसे भुला सकता है? क्या उसे एक बार भी प्रिया की याद नहीं आई? आठ घंटों का प्यार वाकई कोई प्यार हो सकता है?
सोचते सोचते प्रिया की आंखों से आंसू बह निकले। खुद को संभालते हुए वो अपने अपना रूमाल ढूंढने लगी। आदतन आज भी वो अपना रूमाल ऑफिस में ही भूल आई थी। प्रिया कुछ सोच ही रही थी कि इतने में किसीने एक सफेद रंग का जैंट्स रूमाल उसके आगे कर दिया। प्रिया ने नज़रे उठाकर देखा तो एक लड़का बेहद आकर्षक मुस्कान चेहरे पर लिए उसे देख रहा था। उसने रूमाल लेने से इनकार किया तो लड़ने ने “प्लीज़” कहकर उससे अपनी बात मनवा ली। प्रिया ने आंसू पोंछकर उसे “थैंक्स” करते हुए रूमाल वापस दे दिया। वो लड़का उसकी बगल वाली सीट पर ही बैठ गया। आधे घंटे की औपचारिक बातों के बाद दोनों ने एक दूसरे को अपना फोन नंबर दिया। लड़के का स्टॉप आया तो वो बाय करके चले गया। उसके जाते ही प्रिया ने तुरंत बैग से अपना फोन निकाला और फैसल को मैसेज किया, “आधे घंटे में प्यार हो सकता है क्या?”
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